शनिवार, 17 अप्रैल 2010

जूझते हम हिन्दी अखबार के पत्रकार

आप सोच रहे होंगे कि मैंने जूझते शब्द का इस्तेमाल क्यों किया। सवाल जायज है। इसलिए कि मैं क्या, हिन्दी अखबारों में काम करने वाली पूरी की पूरी पत्रकार बिरादरी जूझ रही हैं। टेलीविजन के हिन्दी पत्रकारों की दशा अलग है। वहां भाषा से ज्यादा विजुअल एवं बाइट्स की चलती है। उन्हें बहुत फर्क नहीं पड़ता। उन्हें पैसे भी ठीक मिलते हैं। ठीक से मेरा मतलब है जीने लायक। हिन्दी के कई अखबारों में तो आज भी दिहाड़ी मजदूर के भाव पत्रकारों को पैसे मिलते हैं। अब इस पैसे पर काम करने वाला हिन्दी का पत्रकार बेचारा भी क्या करे। कहां जाएं। कम से कम नेतागण, अधिकारी या फिर कोई सेलीब्रेटी उससे ससम्मान मिलता तो है, उससे दुआ सलाम तो करता है। पत्रकार बेचारा इससे ही खुश हो लेता है। अपने रिश्तेदारों में, घरों में, दोस्तों में अपने रुतबे के बारे में बड़ा ही फक्र से बताता है, फलां मुझे जानता है, फलां से मेरा नाम लेकर मिल लेना, काम हो जाएगा। इस झूठे धौंस के साथ उम्र निकलती जाती है। 30 वर्ष के बाद वह कही के लायक नहीं रह जाता है। फिर शुरू होता है, उसका फ्रसटेशन। आप हैरान रह जाएंगे, कई बड़े अखबारों के उम्रदराज रिपोर्टरों को एनसीआर यानी कि फरीदाबाद, गाजियाबाद, नोएडा, गुड़गांव में सैलरी के नाम पर आज भी 7000-8000 रुपये मिलते है। जहां दो कमरे वाले मकान का किराया कम से कम 5-6 हजार रुपये है। अगर वह अपने परिवार पत्नी व बच्चों को रखने के लिए दो कमरे का मकान लेता है तो खाएगा क्या। बात हुई कि नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या। हर बड़ा पत्रकार हिन्दी को लेकर चिंता जाहिर करता है, हिन्दी मर रही है, हिन्दी अखबार बंद हो रहे हैं, यह हो रहा है, वह हो रहा है, वगैरह, वगैरह। कोई नहीं देखता कि हिन्दी अखबारों के 60 फीसदी पत्रकारों की सैलरी 20 हजार रुपये से कम होती है। वह पत्रकार रहता है दिल्ली में। समाज में उसकी झूठी ही सही, एक इज्जत है। नंगा होकर रह भी नहीं सकता। समाज के कायदे कानून के मुताबिक उसे भी चलना पड़ता है। बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहता है जहां न्यूनतम मासिक फीस 3000 रुपये होती है। मकान मालिक के धौंस को सहते हुए हर महीने समय पर किराया देना है, नाश्ता न सही, खाना तो खाना ही है, चढ़ते ही 10 रुपये के टिकट वाले बस में खबर के लिए यहां-वहां भटकना भी है, बहुत सारे काम है। 20 हजार कमाने के बाद आप सोच सकते हैं कि कभी वह या उसके घर का कोई सदस्य बीमार पड़ गया तो वह क्या करेगा। जो बेचारा, इस शब्द को लेकर बुरा मत मानना मेरे पत्रकार दोस्तों, 10 हजार रुपये कमा रहा है, उसकी क्या हालत होगी, आप सोच सकते हैं। इस पर रोजाना बॉस का धौंस अलग कि तुम्हारी नौकरी कभी भी जा सकती है। अभी कुछ दिन पहले मेरे शहर मुजफ्फरपुर का एक लड़का मुझसे मिला। बोला, भइया फलां अखबार में नौकरी कर रहा हूं, क्राइम देख रहा हूं। लेकिन पैसा काफी कम मिलता है। पूछा तो पता चला, उसे मात्र 4000 रुपये प्रतिमाह मिल रहे थे। एक दोस्त के साथ एक कमरे में जिंदगी गुजार रहा था। अपने हाथ में आश्वासन के सिवा कुछ भी नहीं होने के कारण मैंने हमेशा उससे यही कहा कि लगे रहो, कभी तो अच्छा होगा। मेहनती लड़का है। एक अच्छे क्राइम रिपोर्टर के सभी गुण उसमें है। शायद अब वह किसी दूसरे अखबार में है, 7000 रुपये कमाता है। बता रहा था घरवाले उसकी शादी करना चाहते हैं। आप सोच रहे होंगे मैंने इस अनलकी रिपोर्टर का यहां जिक्र क्यों किया। ताकि आपको बता दूं कि अंग्रेजी के चंडूखाना अखबार में काम करने वाले ट्रेनी रिपोर्टर की भी सैलरी आज की तारीख में कम से कम 15 हजार रुपये है। दो साल में ही वह रिपोर्टर 20 हजार रुपये पर पहुंच जाता है। और फिर 30-40, 50 न जाने कहां तक। हिन्दी अखबार में आप लाख तुर्रम खां हो जाए, कौन पूछ रहा है आपको। कितना कमा लेंगे आप ईमानदारी से, आप बता दीजिए, किसी भी हिन्दी अखबार की सिटी रिपोर्टिंग में किसी सीनियर रिपोर्टर या प्रमुख संवाददाता की मासिक सैलरी 30 हजार से अधिक हो। वह बेचारा तो 10-12 साल के बाद इस मुकाम तक पहुंचा है। अंग्रेजी में विशेष संवाददाता बनने के लिए पांच साल का समय काफी होता है।
मैं आपको अपना उदाहरण देता हूं। वर्ष 2004 में मुझे सब-एडीटर से सीनियर सब-एडीटर बना दिया गया। चार लोगों को सिटी रिपोर्टिंग टीम में प्रमोशन दिया गया था। मैं भी उनमें शामिल था। तब मैं हिन्दुस्तान अखबार में काम करता था। मेरे बॉस ने अपनी आंखों से अहसान जताते हुए प्रमोशन की बात सार्वजनिक होने से एक दिन पहले मुझसे कहा था, तुम्हारा प्रमोशन करा दिया है। जैसे मैं इस काबिल नहीं था या फिर उनका यह कहने का मतलब था कि तुम तो कीड़े-मकोड़े हो, फिर भी मैंने ध्यान रखा। मैंने भी औपचारिकता वश उन्हें धन्यवाद कहा था। जो कुछ भी हो, मुझे खुशी इस बात की थी कि प्रमोशन हुआ है पैसे भी कम से कम हजार रुपये बढ़े होंगे। पर जब चिट्ठी हाथ में आई तो सारी खुशी छू-मंतर हो गयी। मात्र 200 या 250 रुपये बढ़े थे। एक और मजेदार बात बताते हैं। उस समय के मेरे एक वरिष्ठ जो आज भी उस अखबार में सम्मानित अोहदे पर विराजमान है, मुझसे कहा कि जाकर आरई का पैर छू लो। तुमलोग तो बहुत ही किस्मत वाले हो कि बहुत जल्दी प्रमोशन मिल गया हमारे जमाने में तो 10-15 साल के पहले कोई प्रमोशन नहीं मिलता था। उसी दिन हिन्दुस्तान टाइम्स की एक ट्रेनी रिपोर्टर को कनफर्म किया गया था और उसे 5 हजार रुपये का इंक्रीमेंट दिया गया था। आप समझ रहे होंगे मैंने इस बात का जिक्र यहां क्यों किया है। कहने को बहुत कुछ है पर समय नहीं है। घर भी चलाना है कल के लिए स्टोरी की तैयारी भी करनी है। अपने अनुभव या फिर अपने हिन्दी के पत्रकार साथियों के अनुभव को सुनाएंगे तो बिना सनसनी या भूतहा सीरियल देखे आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे, आंखों से आंसू निकल आएंगे। बहुत दिमाग खाया आपका, नमस्कार।

कोई टिप्पणी नहीं: